युवराज ,योगी, और शहज़ादा !

योगी वो है- जो छत्रिय कुल में राज पाठ छोड़, सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध हो गए |

युवराज ,योगी, और शहज़ादा ! August 20, 2017

योगी ,युवराज से एक साल छोटे और शहज़ादे से एक साल बड़े है | यानी बड़े मिया और छोटे मियां के बीच में है योगी | युवराज और शहज़ादे से इतने खफा है कि उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया कि ” दिल्ली में बैठा कोई युवराज और लखनऊ में बैठा शहज़ादा स्वच्छता अभियान का महत्व नहीं समझेगा और गोरखपुर उनके लिए पिकनिक की जगह नहीं बननी चाहिए।”
अब सवाल ये है कि इन तीनो में योगी कौन है? युवराज कौन है ? और शहज़ादा कौन है ?
योगी का शब्दार्थ -आत्मज्ञानी,योग साधना करनेवाला व्यक्ति
युवराज का मतलब – राजकुमार या शहज़ादा
और शहज़ादा का शब्दार्थ – युवराज , राजपुत्र
यानि योगी सिद्धपुरुष ,आत्मज्ञानी है ,तो युवराज और शहज़ादा एक दूसरे के प्रयायवाची है |
जब हम किसी को कटाक्ष रूप से राजनीती में युवराज या शहज़ादा पुकारते है तो उसका मतलब बेफिक्री ,बेपरवाह राजनेता |
अब हमारी नज़र में युवराज और शहज़ादे के उदहारण – कही इन्हे गर्मी न लग जाय ,कही चिलचिलाती धुप से इन्हे झूझना न पड़े |जब ये कही बैठे तो इनके लिए गद्देदार सोफे होने चाहिए ,इन शहज़ादों और युवराजों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि वो जहाँ अपनी शोक संवेदना प्रकट करने पहुंचे हो वहा कोई महान व्यक्ति अपने प्राणो को न्योछावर कर देश के लिए शहीद हो गया हो | (उत्तर प्रदेश के देवरिया की घटना का इससे कोई लेना देना नहीं है,ये लेखक के काल्पनिक विचार है )
हमारी नज़र में युवराज और शहज़ादे वो है -जो किसी भी मेहनती दलित वर्ग से जब मिलता है तो उन्हें उसका राजपाठ संभालने वाले लोग, इन लोगो को साबुन से पहले नहलवाता है फिर उन्हें परफ्यूम देता है ताकि युवराजों और शहज़ादों के नाक में उनके मेहनतकश शरीर के खुशबूदार पसीने की दुर्गन्ध न आये|

हमारी नज़र में युवराज और शहज़ादे वो है- जो आत्मज्ञानी नहीं है बल्कि लोभी है,जिन्हे आध्यात्म और सिद्धि से कोई लेना देना नहीं है,वो सन्यासी जीवन के बारे में अज्ञानी है ,उन्हें बस सत्ता का लोभ है |
और हमारी नज़र में योगी वो है– जो छत्रिय कुल में राज पाठ छोड़, सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध हो गए |

(पं. केवल आनंद जोशी के शब्दों में )… योगी तो घुमक्कड़ होता है ,वह तो दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है।
ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे सिले कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को सींगी सेली कहते हैं।
इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर श्आदेशश् या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें बैरागी, उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं।

उम्र के हिसाब से युवराज (बड़े मिया )और शहज़ादे (छोटे मियां) के बीच फसे योगी अभी अपनी साधुत्व जीवन से परे है ,हठ से सत्ता का योग चला रहे है और युवराज और शहज़ादे गाना गए रहे है —

हम जो काम करे वो खुलेआम करे
हमको लोग यहा यूँही बदनाम करे,
ओ मेरी जाने जिगर हमको सबकी खबर
कोई भी बच ना सका इतनी तेज़ नज़र
हम जहा यार गये बाज़ी मार गये,
अपनी जीत हुई दुश्मन हार गये,

बड़े मियाँ बड़े मियाँ
छोटे मिया शुभान अल्लाह |

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