The Correspondent

राख The Burning Soul फिल्म ने खोली चंडीगढ़ प्रशासन की आँखे|नोकिया 8 पहुंचा भारत, अब मिलने लगेगा बाजार में|National workshop on “Sports for All” in New Delhi|Air Chief Marshal on an official visit to USA|अब एंबुलेंस पर नहीं होगी मुख्यमंत्री की तस्वीर|ईडी ने कार्ति चिदंबरम पर कसा शिकंजा|नहीं बनेगी नई पार्टी : मुलायम सिंह|पंजाब युनिवर्सिटी सीनेट बैठक से वीसी ने किया वॉक आउट !|सऊदी के शासक की तस्वीर बन गई मज़ाक|अखाड़ा परिषद ने जारी की फर्जी बाबाओं की लिस्ट जानिए कौन कौन है?|बॉलीवुड प्रोड्यूसर ने किया सरेंडर|आखिर कब रूकेगे रेल हादसे ?|गुरदासपुर में सियासी पारा चढ़ा|सीबीआई पहुंची 'रयान इंटरनेशनल स्कूल'|मीडिया के सामने छलका हनीप्रीत के पूर्व हनी का दर्द

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ

जन्मदिन विशेष---भारत के महाकवि मैथिलीशरण गुप्त जिनको 1932 में महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि का नाम दिया था|

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ August 3, 2017

 

आज राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त का जन्मदिन है और उनकी एक कविता “किसान “आज के सन्दर्भ में सटीक बैठती है मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त सन 1886 में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। महात्मा गांधी ने उन्हें “राष्टकवि” की संज्ञा प्रदान की,1952 -1964 तक वो राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुये, सन्1953 ई. में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया|
आज देश में किसान का हाल दयनीय है ,और गुप्तजी की कविता आज के दौर में सटीक बैठती है|

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है

Share on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Leave a Reply